जीवन परिचय

 

 

 

आँखों में उज्जवल भविष्य की चमक, चेहरे पर अपने लोगों के लिए कुछ कर गुजरने का आत्मविश्वास एवं एक आत्मीय मुस्कान लिए कोई व्यक्ति अगर आपको मिलता है, तो समझ लीजिए कि आपकी मुलाकात श्री अजय गोयल जी से हुई है. गोयल जी का नर्म स्वभाव और लोगों का दुःख-दर्द साझा करने की प्रवृत्ति ही उन्हें लोगों के बीच लोकप्रिय बनाती है. इसी वजह से हर व्यक्ति उनसे एक जुड़ाव सा महसूस करता है. उनका प्रखर व्यक्तित्व उनके इर्द-गिर्द एक ऐसे आभामंडल का निर्माण करता है जिससे लोग उनके पास खिंचे चले आते हैं.

ये लोगों का उनपे विश्वास ही है जो उन्हें बिना रुके, बिना थके लोक हित के लिए काम करने की प्रेरणा देता है. उनका ये जीवन जनता की सेवा में ही समर्पित है.


जीवन परिचय

श्री अजय गोयल जी का जन्म वर्ष 1961 में 11 जुलाई को देव उठनी एकादशी के दिन तत्कालीन सरगुजा जिले के भइयाथान (झिलमिली) नामक स्थान पर हुआ. उनकी प्रारंभिक शिक्षा प्राथमिक पाठ्यशाला बिश्रामपुर से एवं आगे की शिक्षा आदर्श उच्च. मा. शाला बिश्रामपुर से हुई. विद्यालयीन जीवन में दो शिक्षकों का उन पर बहुत प्रभाव रहा, यादव सर एवं शुक्ला सर. जहां यादव सर का प्यार उनको विद्यालय खींच लाता, तो वहीं शुक्ला सर का व्यवहार उनको अनुशासन सिखाता. यही प्यार भरा व्यव्हार और अनुशासन आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का भी हिस्सा बन गए. लोक हित की भावना से प्रेरित गोयल जी की राजनीतिशास्त्र व सोशियोलॉजी विषयों में सहज रुचि रही, जिसके कारण उन्होंने अम्बिकापुर के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से बी.ए. की शिक्षा हासिल की.

बाल्यकाल से ही गोयल जी की खेलकूद में भी विशेष रूचि थी. इसी के चलते वे बिश्रामपुर में आयोजित होने वाले स्वयं सेवक संघ की शाखाओं का हिस्सा बनने लगे और आगे चलकर संघ से जुड़ गए. श्री गोयल को संघ से जोड़ने में मुख्य भूमिका संघ के ही श्री रामनारायण यादव जी एवं श्री रामदयाल जी की रही.

आरएसएस से जुड़ने और संघ की शाखाओं में सम्मिलित होने के उपरांत उन्होंने गण नायक, मुख्य शिक्षक, बौद्धिक प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया. इन सभी दायित्वों के निर्वहन ने उनके अंदर नेतृत्व एवं लक्ष्य को निर्धारित कर उसे हासिल करने की क्षमता का विकास किया.

युवावस्था से ही श्री गोयल सामाजिक गतिविधियों से जुड़े हुए थे. उन्होंने एक संगठन का निर्माण किया जिसका नाम अग्रवाल नवजागृति समिति रखा. इसके अंतर्गत तात्कालीन समय की सबसे बड़ी नेत्र शिविर भी लगाई जिसमें करीब 700 से 800 सदस्यों ने लाभ उठाया. उनकी ये जनसेवा की भावना ही थी जिसने उन्हें और भी जनहितकारी कार्यक्रम जैसे विद्वान, आरोग्यम, जन जागृति अभियान आदि के लिए प्रेरित किया.


पारिवारिक पृष्ठभूमि

श्री गोयल जी का जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था. पिताजी एक भ्रमणकर्ता व्यवसायी थे एवं उनकी कृषि में भी अभिरुचि थी. माताजी धर्मपरायण एवं भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों में विश्वास रखने वाली सुदृढ़ व्यक्तित्व की महिला एवं कुशल गृहणी थीं. श्री गोयल के दादा जी विद्यालय के प्रधानाध्यापक थे. अपने पालकों से उन्हें अच्छे संस्कार प्राप्त हुए. पिताजी की कृषि में अभिरुचि ने उन्हें समाज में किसानों के अमूल्य योगदान का परिचय कराया. माताजी ने उनमें भारतीय संस्कारों का संचार किया एवं भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम बढ़ाया. दादाजी के द्वारा उन्हें जरूरी मानव आदर्शों का ज्ञान मिला. इन सब को अजय गोयल जी ने अच्छे से आत्मसात कर लिया और ये उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा हो गए.

परिवार में कुल 9 सदस्य थे जिनमें उनके माता-पिता के अलावा 6 भाई और 1 बहन शामिल हैं. उनके सरल व्यक्तित्व और सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने के नज़रिए के पीछे उनके पारिवारिक मूल्यों का बड़ा हाथ रहा है.

विद्यालयीन शिक्षा के बाद ही श्री गोयल 17 जून 1981 को परिणय सूत्र में बंध गए. उनकी सहधर्मिणी भी उनकी माता की तरह ही सरल स्वाभाव एवं सुदृढ़ व्यक्तित्व की महिला हैं.

शिक्षा के क्षेत्र में विशेष कार्यि

श्री अजय गोयल जी हमेशा से क्षेत्र में शिक्षा को बढ़ावा देते आये हैं. यही कारण है की 1969 में निर्मित सरस्वती शिशु मंदिर, बिश्रामपुर को श्री अजय गोयल जी का विशेष सरंक्षण प्राप्त रहा है. उनके विशेष प्रयासों से ही इस विद्यालय का भवन निर्माण हुआ. उनके निरंतर प्रयासों से ही विद्यालय को माध्यमिक और पूर्व माध्यमिक शाला का दर्जा प्राप्त हुआ. वे वर्ष 1993 से आज तक इस विद्यालय के संचालन समिति के अध्यक्ष हैं.